मंजिल भी उसकी थी रास्ता भी रस्ता भी उस का था ,
में अकेला और काफिला भी उसका था ,
साथ साथ चलना है ये सोचना भी उसका था .
फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था ,
आज में अकेला क्यों हु ,
दिल सवाल करता है
लोग तो उसके थे ,
क्या खुदा भी उसका था।
डॉ -इकराम हाश्मी
डॉ -इकराम हाश्मी


